कुछ शेर

कल रात जो देखा आपको छ्तपर तारे गिनते हुए
लगा के हम आजतक चांद पत्थरको समझ रहे थे
और जब देखा दिनमे आपको सजदेमे सर झुकाए
लगा के फ़िज़ूल ही हम एहतराम काबे का कर थे
एक नजर जब वो झाकते है घर छोड़ने से पहले
फिर मुड़कर चले जाते है दिनभर न आने के लिए
कुछ खनकनेकी आवाज हमें हर बार सुनायी देती है
और लोग कहते है नवाज आइनों के दिल नहीं होते
आज आईना भी देखकर बड़ा खुश हो रहा है ‘नवाज’
कहता है मेरे हमशक्लसे कभी उसकी मुलाक़ात हुई थी
नही जानते के उनसे हमारा
किस जनम का रिशता है नवाज
बिन कहे भी सब कुछ कह जाते है हम
और वो बिन सुने ही सब समज जाते है
वह तो अपनी दो आंखोसेही सब कह जाते है नवाज
मेरी मानलो तो अब ये शेरोशायरी का पेशा छोड ही दो
हमने बहोत देखे है दुनिया के सलीके ‘नवाज’
पैसों की गिनती भी तो थूक लगाकर करते है ये लोग
उनसे भले ही तुम्हे गम-आझी मिली हो,
तुम्हे तो फिर भी दिलोंपे अपना दस्तखत छोड जाना है
जिंदगी एक खुबसुरत गजल है ‘नवाज’
और तुम्हे आखरी मक्ते में अपना तक्ख्ल्लुस छोड जाना है
उल्फत की जंग में जख्म-ए-दिलों की हिसाबदारी मत रख ‘नवाज’
मोह्ब्बत के होने-न होने का फैसलाही तो पंखुड़ियाँ तोड़कर किया जाता है
लोग कहते है एक आग का दरिया ये, तू बस याद रख जहनमे इतनाही
जलेगा तो जुगनू कहलाएगा, मिटेगा तो मजनू कहलाएगा
गैरों की मय्यतोंमे जी भर के चीखले “नवाज”,
जब निकलेगा तेरा जनाजा, कहाँ मौका मिलेगा
आती है लहरें, जाती है लहरें, साहिल की तरह सहना सीखले
आती है हवाएँ, जाती है हवाएँ, कश्ती की तरह बहना सीखले
कहर बरसायेगा बवंडर जब, बाँजकी तरह लड़ना सीखले
छूट जायंगे साथी कभी न कभी, जिंदगी तू बढ़ते रहना सीखले
कभी रात थी काली चादरकी तरह लपेटली,
कभी कडवी सच्चाई थी दवा समझकर गटकली
जब खुशी बनके आयी जिंदगी हमने खैरातमे लुटायी,
और जब तनहाईमे दर्द बनके आयी हमने होठोंसे लगायी

ढूंड रहा हूं एक शायर की खोयी हुई मौसिकी को
दुनिया की भगदड़में बिछडी हुई शायरी को
रोटी कपडे के चक्करमे पीछे छुटी जिन्दादिली को
जज्बातों की कशमकश में सहमी हुई जिंदगी को..

नजरे मिलाकर नजरे झुकानेकी आदत तो आपने आजभी बदली नही
फिर दिल लगाकर दिल जलानेका इल्झाम हमे किस हैसियत से दे रहे हो?

बड़े दिनो के बाद आसमानसे रसकी पुहार हुई है आज,
शायद इसीलिए के आपकी नज़रे हमसे चार हुई है आज
एक अरसे के बाद पलकों से चादर नींदकी उठी है आज,
न जाने क्यूँ फिर दिनमे ख्वाब देखने की तमन्ना मचल उठी है आज

हम इंतजार है करते इस दरपे बैठे तेरी पायल की झनकार का,
के मुलाकात से ज्यादा खुशी इस दिलको तेरी आहटोंसे होती है

जिंदगी मे और भी गम है मोहोब्बत के सिवा
पर जिंदगी तेरी बस एक भरम है मोहोब्बत के सिवा
रहमोकरम तो बहूत है इस रस्म-ए-उल्फत के सिवा
पर क्या हसी सितम है कोई इस निगाहे करम के सिवा

अब क्यों भीगे रुख्सारोंको सफेद रुमाल के पीछे छुपा रहे हो
कत्ल ही करना था तो कम से कम खंजर पर अपना नाम लिखा होता

हर दिन निकलता है उनकी उल्फत का नजारा लेकर
के हर रात निकलती है उनके न होने का एहसास लेकर
और फिरभी पूछते है ये जालीम दुनियावाले
के क्यूं हम दुनिया के डूबने का इंतजार इतनी बेसबरीसे कर रहे है

अपने दिल को रोज टूटते हुए देखा है हमने आपकी हर मुस्कान पर
और फिर आपकी वही मुस्कराहट इसे धडकनेका सबब देती है
मिलता नही तो बस जवाब इक सवाल का के इस मासूम जान का क्या करे
जो आपके इश्क़मे इस तरह उलझी है के निकलती ही नहीं

शमा के हर मुस्कान पे जलजाए हम वो परवाने है
छलके जो साकीके लरजते हातोंसे हम वो महकश पैमाने है
टूट जायेतो तो खनक ना हो शीशेका वह दिल रखते है
लूट जाए मोहोब्बतमे तो अफ़सोस ना हो इश्क़ मे बस इतना उसूल रखते है

चल चले वहाँ जहाँ समंदरों के साहिल न हो
उम्र की सीमा न हो, न हो रिश्तों की सरहदें
चल चले वहां जहाँ रवायतों की दहलीज न हो
और जहाँ प्यार का नाम प्यार हो जंजीर न हो

बादल गरजके चल दिए,
सावन बरस के चल दिया
पतझड़ ही रहा मेरे दिलका मौसम फिरभी,
यह चाँद जैसे फुला नहीं के फिर सिमट गया

गैरों की मय्यतोंमे जी भर के चीखले ‘नवाज’,
जब निकलेगा तेरा जनाजा, कहाँ मौका मिलेगा
मक़बरे संगेमरवारके बनानेवाले तो बहौत मिलेंगे आपको
पर अगर जूनून है फना होनेका तो हमारे पास आईयेगा

 

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2 thoughts on “कुछ शेर

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