एक शायरी बेबसी के नाम

क्या बताये तुम्हे जिंदगी कैसे गुजर रही है
अकेलेपनकी तो अब बस आदतसी हो गयी है
भूख, मजबूरी और बेकारी सेहरा बाँधने खड़ी है
एक होती तो निभा लेता तीनोंही पीछे पडी है

रोटी नसीब नहीं हुई तो क्या ठोकरें खाकर  जीते  है
अपनेही अश्क शीशों में भरकर जाम समझ कर पीते है
महफ़िल सजाने तू नहीं तो क्या  मच्छरों संग गाते है
पहले तुम्हारे ख्वाब सजाते है अब सेज खटमलोंसे सजाते है

कटती नहीं रात अकेलेमें आंखोंसे नींदेही उड़ गयी है
ये तेरी यादों का कसूर नहीं कम्बखत बिजली चली गयी  है
क्या बिगाड़ा था मैंने जो तुम यूँ रूठकर चली गयी
एक तस्वीर तुम्हारी सीनेसे लगाके रखी थी कल रात चूहों ने वहभी कुतरदी

मैंने सुना था के कबूतर मोहोब्बत का पैगाम लाते है
मगर मेरी खिड़कियों पर तो वो न जाने किस जनम का इंतकाम छोड़ जाते है
बरखा भी रुसवा हो गयी, म्युनिसिपालिटी भी खफा हो गयी
बिना पानी के जैसे कपड़ों की धुलाई भी अधूरी रह गयी

दो बूँद आसूंओं के बहा देना कभी हमारे लिएभी, उसीमें गंगा नहालेंगे
कभी याद कर लेना तनहाईमे, चार दिन और खालीपेट काटलेंगे
चले आये थे तुझसे दूर होकर अपनी किस्मत आजमाने के लिए
अब अकेलेही बैठे बैठे यहाँ जिंदगीसे जुआ खेल रहे है

रहने की ख्वाहिश थी तेरी दिलमे बेबस अब इस चारपाई पे पड़े है
कलतक जो दुनियावाले हमें शायर समझते थे आज वही पागल कह रहे है

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बूंद

कभी बूंद बनकर आओ, कभी घटा बरसकर आओ
कभी सुनहरी धूप होकर बादलोंसे निकलकर आओ
कभी बनकर दामिनी, आसमासे कडकती आओ
कभी बनकर रागिनी, झंकारसे फडकती आओ

कभी मोह बनकर आओ, कभी माया बनकर
कभी सुरत, कभी मूरत, कभी साया बनकर आओ
कभी ख्वाहिश बनकर आओ, कभी नुमाईश बनकर
कभी मेरे गमगीन दिलकी गुजारिश बनकर आओ

आओ कभी फुरसतमे, बैठो सामने फर्माइश बनकर
और कभी फुरकतमे, ख्वाबों की आजमाईश बनकर
एक रोज आओ तो सही, वादों को निभाने के लिए
एक रोज आओ तो सही, फिर न वापस जाने के लिए

 

गुजारिश

बूंद बूंद से भर दे, ए आसमाँ मेरे अरमानों को
मूंद मूंद कर देख रही, इन पलकों के पैमानों को
गिन गिन जो किया था, वो हिसाब आज पुरा करदे
दिन दिन जो किया था, वो इंतजार अब खत्म करदे

अंग अंग मे उठे जो, फिर ऐसी उमंग दे जा
रंग रंग मे बिखरे जो, रोशनी की वो तरंग दे जा
साँस साँस मे समा जाए, मिटट्टीमे वो खुशबू भर जा
बास बास मे सूनाई दे, हवा से वो गुफ़्तगू कर जा

रुक रुक के चलना कभी, कागजकी नावमे
झुक झुक के खिलना थोडी, पेंडों की डालमे
लपक झपक चल घुंगरू बजा, पायलकी खनकार बन
उमड घुमड कर डमरू बजा, तांडवकी हुंकार बन

बूंद बूंद से भर दे, ए आसमाँ मेरे अरमानों को
मूंद मूंद कर देख रही, इन पलकों के पैमानों को
रात रात भर जो तू बरसे, तो कुछ बात चलाऊं मैं
बात बात पर बिगडने वाले, मेरे यारको मनालूं मैं

माँ

ना ईश्वर ना खुदा कहा था
मैंने अपना पहला शब्द माँ कहा था

आँखे खुली तो देखा, कभी आँखे मूंदकर देखा
वो चेहरा जो हर पल मुस्कुरा रहा था
मैंने..

कभी लड़खड़ाता मैं, कभी सहम जाता
उसकी गोद मे मेरा छोटासा आशियाना था
मैंने..

रो पड़ता मैं जब कोई डांट देता
पीठ पर रखे एक हाथ मे गजबका हौसला था
मैंने..

बंद हो जाते जब स्कुल के दरवाजे
बाहर कोई देर तक इंतजार करता था
मैंने..

चोट लगती थी जब या कभी बुखार आता
पल्लू से पोछने से उसके दर्द गायब हो जाता था
मैंने..

दुनिया की नज़रों में शायद मैं बडा हो गया
पर उसकी नजरमें आजभी टिमटिमाता तारा था
मैंने..

कहती न थी वो किसीसे बस गुमसुमसी रहती थी
घरसे दूर होने पर जब मैं याद आता था
मैंने..

एक अरसे के बाद माँ से मिला जब
पता नही बातों बातों में कब दिन ढल चुका था
मैंने..

आजभी जब लिखते लिखते आंखे भर आयी थी
बातें करने उससे मैंने उसे बीच रात जगाया था

ना ईश्वर ना खुदा कहा था
मैंने अपना पहला शब्द माँ कहा था।।

मुलाकात

एक कहानी मुझेभी तुमसे कहनी थी
मेरी मुलाकात एक परी से हुई थी

खोया सा चल रह था मे अकेला किसी रस्ते पे
जब थी मुझसे वह पहली दफा
आयी थी आसमान से उतरके मेरे सामने
भूल गया था मैं एक पल के लिये दुनीया
उस दिन से जबही किसी सवाल मे मैं उलझता
बस उसका नाम लेकर उसको याद करता
बदल देती मेरी हर बैचैनी को धुएमे
और लेजाती मुझे उडाके ख्वाबों के जहाँमे
शुक्रिया जब करता उसके चेहरे को देख
इनकार कर देती उसकी नजर बीना कुछ कहे
अब हर तारीख मे मेरे उसीकी शायरी थी,
मेरी मुलाकात एक परी से हुई थी।

महक उठती थी हवाएं उसके आने से,
भूल जाती तितलीयाँ, फूलोंको अचानक से
छुप जाते सीतारे बादलों के पर्देमे
और शीशे के हो जाते, आईने पलभर के लिए
उसकी नज़रों को देख, शामभी ढलने से इतराती
मुस्कुराती वोह और रातों पे सहर छा जाती
आसूओं मे भी उसके शब् की नमी थी
मेरी मुलाकात एक परी से हुई थी।

उसने कभी मुझे ये सब कहने का मौका ही नही दिया,
एक दिन जब उड़ गयी वह वापस ना आनेके लिए
खो गया फिरसे मैं, उसे आसमानों से पुकारा
नाम लेकर उसका उसे हर जगह धुंडा
पर शायद अब तक बहोत देर हो गयी थी,
सफेद परों को लहराये वह कही दूर उड़ चुकी थी
ना निशानी है उसकी कोई, ना पता ना ठीकाना
यादों मे छोड़ गयी मेरे वह एहसास अपना
वहम था ये मेरा या उसीकी जादुगीरी थी
सच कहता हूँ… मेरी मुलाकात एक परी से हुई थी

फुरकत

आ लगाले गले इस मदहोश रातको,
कल थामने इसे शायद यहाँ हम ना होकहने दे बातोंमे, जो अबतक ना कहा,
लब्जोंकी शायद कल इतनी हिम्मत ना हो

बढ़नेदे धड्कनको, साँसोंकी दहलीजसे आगे
दिलोंमे कल शायद इतनी हरकत ना हो

आखोंसे महसूस करने दे, आखोंकोही बयाँ करनेदे
जज्बातोंकी शायद कल कोई सूरत ना हो

होटोंसे छुलेनेदे होटोंको, हयाकी लाली बिखरने दे ज़रा
चाँद फिर शायद इतने करीब ना हो

रंग फ़ुलोंमे भरने दे ज़रा, फिजा महक उठने दे
शायद कल दिलोंमे जुदाईकी यूँ तड़प ना हो

जीभरके देखने दे तुझे,ख्वाबोंको शक्ल देने दे जरा
लकीरोंकी शायद कल इतनी हैसियत ना हो

इस पलमें जीलेनेदे ज़रा, लम्होंको जहनमे सिमटे हुए
जिंदगीमे शायद फिर कभी फुरकतही ना हो

अनामिका

तुझे देखकर आज
फिर मचला है दिल
हकीकतकी सलाखेन तोड
तेरी और निकला है दिल

तुझे देखकर एक पल
रंगीन हुई ही फिजाये
फूलों का रंग फिर
क्यू फिकासा लग रहा है

तुझे देखकर आज
फिर महका है मौसम
बिनमक्सद बिनबादल
क्यों बरसने लगा है दिल

तुझे देखकर आज
रोशन हुई है कायनात
तेरी रौनको से चकाचौंध
आज राहोंका अंधेरा है

तुझे देखकर आज
फिर खुला है आसमान
जमीं का छोड नीचे
किस छोर उडने लगा है दिल

तुझे देखकर आज लगा है के
आलम ही कुछ नया है
हर सांस एक जवाब है
और हर धडकन एक सवाल है

तुझे देखकर आज जैसे
बन रही है कुछ बात
और फिर अपने आपपर ही
क्यू बिगडने लगा है दिल

दरख्वास्त

इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे के सारी उम्र आपकी हमारे लिए संवरनेमे गुजर जाए
इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे के आईने छोड आपको इन आंखोंमें झांकने का मन हो जाए

इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे के दिलसे निकला हर गलीज ख़यालभी गजल कहलाये
इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे, के कलाम-ए-पाक से पहले जूबांपार आप का नाम आये

इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे, के पल्के झपकनेकोभी एक अरसा लगने लगे
इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे, के लबों के बीच की दूरी भी फासला लगने लगे

इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे के इन बाहोंकी तपीश में जलकर सुलघने का मन करे
इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे के इन जुल्फोंकी सलांखोंमें बारबार उलझने का मन करे

इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे के रिश्तो में गिलो-शिकवो की अहमियत न रहे
इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे के उसे निभाने के लिये वादे-कसमों की जरूरत न रहे

इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे के सौतन जिंदगीको हर बात पर आपकी शिकायत करनी पडे
और इश्क इतनाभी न कीजिये हमसे के मौत को भी हमे छुनेसे पहले आपसे इजाजत लेनी पडे

नि:शब्द

सरेआम मासूम जान इक जब हो रही थी जलील,

चीख चीखकर बेबसी जब सुना रही थी दलील

दिल्ली बता उसवक्त कहा सोया था तेरा दिल?

 

हवस के मीनाबज़ारमें जब लीलाम हो रहे थे जमीर,

रामलीला की भूमीमें जब सीतामाँ पे चले तीर

दिल्ली बता उसवक्त कहा सोया था तेरा दिल?

 

तहजीब जब हैवानीयत में हो रही थे तब्दील,

खामोश रात के सीने में जब धस रही थी कील

दिल्ली बता उसवक्त कहा सोया था तेरा दिल?

 

रवायतों के गुलामों ने कुछ न कहा, सियासत के इमामों ने कुछ नहीं कहा

क्या तू भी गर्दन झुकाए हो गयी है उनकी साजिशोंमे शामिल

सच बता दिल्ली क्या कुछ नहीं कहता तेरा दिल?

इतनी मुद्दत बाद मिले हो (Reprise)

Inspired from the original gazal by Janaab Mohsin Naqui

इतनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचों में गुम रहते हो

भीगी वादियों ने पूछा हमसे
हमसे दूर अब क्यूँ रहते हो

न कोई चिटठी, न कोई पता
किस देस में बेखबर रहते हो

बरसते बादल कहने लगे
इतना तो खुलकर कहो

क्या बहते हो बरिशोंमे तुम भी
याद हमें जब जब करते हो

लगजा गले कहे यार मेरे
किन शिकवों में घिरे रहते हो

देती है दस्तक धड़कनकी गूंज
याद हमें जब तुम करते हो

छुपकर हमसे जाओगे कहाँ
दिलमे हरपल जो तुम रहते हो

इतनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचों में गुम रहते हो